जब मेरा सबसे करीबी दोस्त इंसान नहीं रहा | फ्रेंडशिप डे पर आत्मचिंतन | KhabarForYou #TheHealingSpace
- MADHU SHARMA
- 02 Aug, 2026
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आज सुबह उठते ही सबसे पहला ख़याल आया कि फ्रेंडशिप डे है। सोचा, सबसे पहले अपने किसी दोस्त को शुभकामनाएँ दूँ। जैसे ही मोबाइल हाथ में लिया, अचानक मन में एक अजीब-सा विचार आया।
जिस दोस्त को मैं फ्रेंडशिप डे विश करने जा रहा हूँ, उससे पहले क्या मुझे उस "दोस्त" को धन्यवाद नहीं कहना चाहिए, जो पिछले कई वर्षों से हर सुबह सबसे पहले मेरे हाथ में होता है?
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मेरा मोबाइल।
न जाने कब उसने मेरी ज़िंदगी में इतनी जगह बना ली कि दिन की शुरुआत भी उसी से होने लगी और कई बार दिन का अंत भी। कुछ जानना हो, उससे पूछ लेता हूँ। रास्ता भूल जाऊँ, वही रास्ता दिखा देता है। मन उलझा हो, तो बिना थके मेरी बातें सुन लेता है। बिना किसी शिकायत के हर सवाल का जवाब ढूँढ़ने की कोशिश करता है।
देखते ही देखते, इंसानी रिश्तों के बीच मोबाइल मेरा सबसे भरोसेमंद साथी बन गया।
क्या मैं सही दिशा में हूँ?
फिर मन में एक सवाल उठा - क्या मैं सचमुच सही दिशा में जा रहा हूँ?
मुझे पता ही नहीं चला कि कब मैं धीरे-धीरे इंसानों से ज़्यादा मशीनों के करीब होता चला गया।
आज कुछ मिनटों के लिए भी मोबाइल आँखों से ओझल हो जाए, तो बेचैनी होने लगती है। जन्मदिन और सालगिरह की तारीख़ें याद नहीं रहतीं, क्योंकि उन्हें याद रखने की ज़िम्मेदारी भी मैंने मोबाइल को सौंप दी है।
अब किसी अपने से मिलने से ज़्यादा, कभी-कभी वीडियो देखना आसान लगता है। दोस्तों के साथ बैठकर खाना खाने से ज़्यादा उसकी तस्वीर लेना ज़रूरी लगने लगा है।
पार्क में टहलने जाऊँ, सफ़र पर निकलूँ या किसी का इंतज़ार करूँ - हाथ अनायास ही मोबाइल तलाशने लगते हैं। जैसे उसके बिना कुछ अधूरा हो।
एक दोस्त... जो सब कुछ नहीं कर सकता
तकनीक बहुत कुछ कर सकती है। वह मेरी बातें सुन सकती है, मेरी उलझनों में साथ दे सकती है और कई बार सही रास्ता भी दिखा सकती है।
लेकिन... क्या वह मेरे साथ शाम की चाय पर समोसा खाने चल सकती है?
जब बिना किसी वजह के घर से बाहर निकलने का मन करे, जब रास्ते में ही तय हो कि जाना कहाँ है - क्या वह उन पलों का हिस्सा बन सकती है?
वह मेरे शब्द समझ सकती है, लेकिन क्या मेरी ख़ामोशी भी समझ पाएगी?
शायद नहीं। - यहीं आकर एहसास होता है कि तकनीक एक अच्छी साथी हो सकती है, लेकिन हर रिश्ते की जगह नहीं ले सकती।
मुझे अपना बचपन याद आता है
बचपन में फ्रेंडशिप डे किसी त्योहार से कम नहीं लगता था। कई दिन पहले से रंग-बिरंगे फ्रेंडशिप बैंड खरीदने की तैयारी शुरू हो जाती थी। सबसे अच्छे दोस्त के लिए अलग बैंड, बाकी दोस्तों के लिए अलग और कुछ अतिरिक्त भी—कहीं किसी दोस्त का मन न दुख जाए।
उस समय दोस्ती में दिखावा कम था, अपनापन ज़्यादा था। साथ बैठकर घंटों बातें करना, बिना किसी वजह के मिलना और छोटी-छोटी बातों पर खिलखिलाकर हँस देना—शायद यही दोस्ती थी।
आज पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो उन दोस्तों में से कुछ ही संपर्क में हैं। कई चेहरे याद हैं, लेकिन आवाज़ें कहीं खो गई हैं।
तब मन चुपचाप एक सवाल पूछता है - क्या बदला है... समय, दोस्ती या फिर हम? क्या सचमुच दोस्ती बदल गई है?
शायद नहीं।
बदला है तो हमारा जीने का तरीका।
तकनीक के करीब तो जाना था, लेकिन इतना भी नहीं कि इंसानी रिश्ते ही पीछे छूट जाएँ।
काश, मैं फिर से बिना मोबाइल की स्क्रीन पर नज़र टिकाए, सामने बैठे व्यक्ति की आँखों में देखकर मुस्कुरा सकूँ। बिना किसी नोटिफिकेशन के डर के उससे खुलकर बातें कर सकूँ।
आज घर बैठे हर सामान मँगवाना आसान हो गया है। लेकिन क्या मैं उन छोटी-छोटी मुलाक़ातों को वापस ला सकता हूँ, जब किसी सामान की ज़रूरत से ज़्यादा खुशी रास्ते में किसी दोस्त से मिलने की होती थी?
वो दिन सचमुच अलग थे।
जब मन उदास होता था, तो किसी दोस्त को फ़ोन लगा दिया जाता था। उसने कोई समाधान दिया या नहीं, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता था। उसकी बेवकूफ़ी भरी बातें ही मन का बोझ हल्का कर देती थीं। कई बार दोस्त हमारी समस्या नहीं सुलझाते थे, लेकिन कुछ देर के लिए हमें हमारी परेशानियाँ भुला ज़रूर देते थे।
आज समाधान पहले मिल जाता है, लेकिन सुकून शायद पहले जितना आसानी से नहीं मिलता।
दोस्ती का नया पता
तकनीक ने हमारी ज़िंदगी आसान बनाई है। इसमें कोई संदेह नहीं। उसने दूरियों को कम किया, जानकारी को हमारी उँगलियों तक पहुँचा दिया और कई बार अकेलेपन में एक साथी का एहसास भी दिया।
लेकिन शायद गलती तकनीक की नहीं है।
गलती तब होती है, जब हम उसे उन रिश्तों की जगह बैठा देते हैं, जिनकी गर्माहट किसी स्क्रीन से नहीं मिल सकती।
दोस्ती केवल चैट, इमोजी और स्टेटस का नाम नहीं है। दोस्ती वह है, जहाँ ख़ामोशी भी समझी जाती है। जहाँ मिलने का कोई कारण नहीं होता, फिर भी मुलाक़ात हो जाती है। जहाँ साथ बैठकर चाय पीना, बिना किसी फ़ोटो के भी एक खूबसूरत याद बन जाता है।
शायद दोस्ती आज भी वहीं है... बस हम ही उसके पुराने पते पर कम जाते हैं।
इस फ्रेंडशिप डे पर अगर समय मिले, तो एक बार उस दोस्त को भी याद कर लीजिए, जिसका नंबर आज भी आपके मोबाइल में है, लेकिन जिससे बात किए हुए बरसों बीत गए हैं।
Happy Friendship Day उन सभी दोस्तों के नाम, जो शायद ज़िंदगी की दौड़ में कहीं पीछे छूट गए... लेकिन यादों में आज भी वहीं खड़े हैं।
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